Flyhiee

" वो मेरी पसंद के गुब्बारे "

By Sangeeta Malhotra , India
वो मेरी पसंद के गुब्बारे

 Pressure seen around forced me to write this poem.. Kids in India are suffering pressure from every where.., Parents, Schools, Society...

छोटा सा तीन साल का वो बच्चा ,
गुब्बारे के लिए रोता वो बच्चा
माँ ने ले दिया हरा गुब्बारा ,
पर लाल गुब्बारे के लिए रोता वो बच्चा ।
माँ को आया समझ जब उसके रोने का कारण
जल्दी से बदल दिया गुब्बारा ,
अपनी पसंद का गुब्बारा ले कर खिलखिलाता वो बच्चा ।
वो भी खूब दिन थे ,
जब गुब्बारे भी उसकी पसंद के थे ।

आज तेरह साल बाद,
बड़ा हो गया वो बच्चा
बहुत कुछ समझने लगा वो बच्चा ,
पर अंदर ही अंदर झल्लाने लगा वो बच्चा
गुब्बारे तो सारे कब के फूट गए
लाल हरे रंग पीछे छूट गए
अब तो बस दो ही रंग शेष हैं ,
किताबों के सफ़ेद पन्ने , और अक्षरों के काले रंग ही विशेष हैं
किताबों के विषय भी अब उसकी पसंद के विपरीत थे
वो भी खूब दिन थे ,
जब गुब्बारे भी उसकी पसंद के थे ।

माँ और पिता की वो अधूरी ख्वाहिशें ,
जो अपने बचपन में रह गयी थी अधूरी
नहीं बन पाए जो अपनी जवानी में ,
नहीं हो पायी जो तमनाएँ पूरी
बच्चे के कंधे पर लाद दी अपने सपनो की जिम्मेदारी ,
अपने सपनो से उसे बनानी होगी दूरी
समझ नहीं पाता,की उसके सपने माँ पिता के सपनो से क्यों अलग थे ,
वो भी खूब दिन थे ,
जब गुब्बारे भी उसकी पसंद के थे ।

थोड़ा भार काम करो ,
सांस उसे भी लेने दो
छोटे छोटे पंख दे दो ,
थोड़ा उसे भी उड़ने दो
रास्तों परउसके रोशनी कर दो ,
डगमगाने दो पर उसे चलने दो
जिंदगी सिर्फ काला सफ़ेद नहीं ,
उसे सात रंगो में रंगने दो
वरना सोचेगा सालों बाद , की उसके ख्वाबों के कैनवस क्यों बेरंग थे ,
वो भी खूब दिन थे ,
जब गुब्बारे भी उसकी पसंद के थे ।