एक जहान ऐसा भी ।

छोटे-छोटे थे सपने,
छोटी-छोटी आँखों में
जब रखा था कदम उसने
अनजाने शहर में ।
नहीं जानती थी किसी को ,
बस जानती थी अपने विश्वास को
और था ख़्वाब उसका,
खुद की पहचान ढूंढने का।
वो खुश थी,
पाके अपनी नई ज़िंदगी
जिसमें थे उसके अरमान,
पाने को एक नया आसमान।
उसके सपने भी अनोखे थे,
आसमान नहीं छूना था उसे
बस वहाँ पर बनाना था एक जहान
जिसमें हो अच्छे इंसान ,
ना हो कोई हैवान
ना हो क्रोध या अपमान
बस हो आपसी प्रेम और सम्मान
बसे हर दिल में भगवान ॥

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